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Mar 17, 2011

उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर. . .

एक कटी पतंग की जैसी डोर
उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर
कभी ऊँचे पेड़ो से तकराकर लहराते 
तो कभी हवा के तेज़ झोकों से आज़ाद हो जाते

हैं सफ़र यह निरंथर, न रुखेगी कभी
जो मिली कुशी, तो लगे जिंदगी
और कही मिले निराशी, तो लगे बंदगी
लो बन के अरमान, हम उड़ चले 

चार अक्षर ही लिखे ते नए पन्ने पर
फिर आया बुलावा - एक आवाज़ ऐसी
न चेहरा ता और न थी कोई दिलचस्पी
जब समज आया की बहुत देर हो चुकी

लो फिर निकल लिए हम बोरिया भांद कर
नए राहें और नए मंजिलों के खोज पर 
एक कटी पतंग की जैसी डोर
उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर. . .

Feb 21, 2011

फिर कर शुरुवात ...


नन्हे क़दमों से शुरू किये
जो सफ़र कोमल हाथों के सहारे
लो आज मांगे साथ दुबारा
तुम नहीं तो जग बेगाना

फिर आ कड़ी हूँ मैं चौराहे पर
किस राह पर मंजिल लिखी हैं ?
काले बादलो से लगता हैं दर
तुम्हारे आँचल में समेट, होना हैं बेफिकर

याद हैं मुझे वो एक रूपये का सिक्का 
रोज जमा कर मुझे अमीर बना देना
कब बन गयी तीन रूपये का जुगाड़
कर दिया हर नसीयत तेरी बिगाड़

लो कहो ' फिर कर शुरुवात...'
ख्वाब शीशों का नहीं, यकीन दिला दो
तुम्हारी छोटी छोटी बातों में छिपा हैं खज़ाना
लो आज मांगे साथ दुबारा
तुम नहीं  तो जग बेगाना . . .

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