एक कटी पतंग की जैसी डोर
उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर
कभी ऊँचे पेड़ो से तकराकर लहराते
तो कभी हवा के तेज़ झोकों से आज़ाद हो जाते
हैं सफ़र यह निरंथर, न रुखेगी कभी
जो मिली कुशी, तो लगे जिंदगी
और कही मिले निराशी, तो लगे बंदगी
लो बन के अरमान, हम उड़ चले
चार अक्षर ही लिखे ते नए पन्ने पर
फिर आया बुलावा - एक आवाज़ ऐसी
न चेहरा ता और न थी कोई दिलचस्पी
जब समज आया की बहुत देर हो चुकी
लो फिर निकल लिए हम बोरिया भांद कर
नए राहें और नए मंजिलों के खोज पर
एक कटी पतंग की जैसी डोर
उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर. . .